काव्य वाणी
Shekhar Kumawat's Blog
मुक्तक :-नजरों के तीर
तेरी
नजरों
के
तीर
सब
जिगर
के
पार
हो
गए |
मुसाफिर
सारे
के
सारे
ही
बीमार
हो
गए ||
हादसा
ये
भी
हुआ
,
टूट गए रोजे कई
फकीरों
के |
खुराफातें
तेरी थी,
वो
मालिक
के
गुनाहगार
हो
गए ||
शेखर
कुमावत
और तबाह हो गए
वफ़ा
के
नगमे
गाते
-
गाते
,
यूँ
बेवफ़ा
हो
गए
|
तेरी
खेरियत
का
ख़त
पढ़ा
और
खफा
हो
गए
||
खुदा
ने
तुझे
किस
मिटटी
से
बनाया
जालिम
|
आए
तेरे
दीदार
के
वास्ते
,
और
तबाह
हो
गए
||
शेखर कुमावत
मुक्तक- ले आई मुझे मयखाने में
शाम ढल गई , सूरज डूब गया सागर में |
और तेरी यादें, ले गई मुझे मयखाने में ||
लोग कहतें
संभलझा
, ए बाली उमरिया |
इश्क नहीं इतना आसां, इस ज़माने में ||
शेखर कुमावत
तेरा दीदार
पूर्णिमा की रात, होगा बेशक तेरा
दीदार किसी तरह
|
मगर निकल गया
बेवफा
ये आसमां भी तेरी तरह ||
उस रात, रात भर छाई घटायें फलक में चारो ओर |
चाँद दिखा ना तुम दिखे , अमावस्या की
तरह ||
शेखर कुमावत
मुक्तक :- तुमसे पलटा न गया
उठ कर जो गये तुम, हमसे देखा भी न गया |
जाम छलकते रहे , हमसे पिया भी न गया ||
आज भी आवाजें देता हूँ हर रात के अँधेरे में |
खड़ा
हो
उसी
मोड़
पर
,
जहाँ
तुम
से
पलटा
न
गया
||
शेखर कुमावत
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