मुक्तक :-नजरों के तीर


तेरी नजरों के तीर सब जिगर के पार हो गए |
मुसाफिर सारे के सारे ही बीमार हो गए ||

हादसा ये भी हुआ, टूट गए रोजे कई फकीरों के |
खुराफातें तेरी थी, वो मालिक के गुनाहगार हो गए ||

शेखर कुमावत

और तबाह हो गए


वफ़ा के नगमे गाते-गाते, यूँ बेवफ़ा हो गए |
तेरी खेरियत का ख़त पढ़ा और खफा हो गए ||

खुदा ने तुझे किस मिटटी से बनाया जालिम |
आए तेरे दीदार के वास्ते, और तबाह हो गए ||

शेखर कुमावत

मुक्तक- ले आई मुझे मयखाने में


शाम ढल गई , सूरज डूब गया सागर में |
और तेरी यादें, ले गई मुझे मयखाने में ||

लोग कहतें संभलझा , ए बाली उमरिया |
इश्क नहीं इतना आसां, इस ज़माने में ||



शेखर कुमावत

तेरा दीदार


पूर्णिमा की रात, होगा बेशक तेरा
दीदार किसी तरह |
मगर निकल गया बेवफा ये आसमां भी तेरी तरह ||

उस रात, रात भर छाई घटायें फलक में चारो ओर |
चाँद दिखा ना तुम दिखे , अमावस्या की तरह ||




शेखर कुमावत

मुक्तक :- तुमसे पलटा न गया


उठ कर जो गये तुम, हमसे देखा भी न गया |
जाम छलकते रहे , हमसे पिया भी न गया ||

आज भी आवाजें देता हूँ हर रात के अँधेरे में |
खड़ा हो उसी मोड़ पर, जहाँ तुमसे पलटा गया ||

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शेखर कुमावत


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