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मुस्कुराते बहुत है

 लगा के मेहंदी वो इतराते बहुत है

अकेले में वो मुस्कुराते बहुत है


शरमा के वो जब आईना देखते

खुद-ब-खुद वो लज्जाते बहुत है


रह कर भी साजन की बाहों में 

मेरी यादो में खो जाते बहुत है


इससे बड़ी क्या सजा है मेरी

मेरे हिस्से के आंसू बहाते बहुत है


एक अरसे से जुदा है मुझ से

जाने क्यों मेरे दिल में आते बहुत है


 © Shekhar Kumawat 



मोहब्बत है तो है


 

मुझे उनसे, मोहब्बत है तो है
उसे भी मुझसे नफरत है तो है

चाहूँ में उसको, ये आरजू मेरी
ये जमाने से बगावत है तो है

ख्वाबो में उसके, में आ जाउँ
ये मेरी दिली हसरत है तो है

उम्र भर रहना है, जुदा होकर
ये मेरी बदकिस्मत है तो है

 © Shekhar Kumawat 



दूर रहती तो है .........

दूर रहती तो है पर सताती बहुत है ।
भुलाता तो हूँ पर याद आती बहुत है ।।

बात ख्वाबो तक हो तो ठीक थी ।
मगर जहन में आती बहुत है ।।

तस्वीरो से दीवाना बना रखा है ।
गर सामने आये तो क़यामत बहुत है ।।

रुट कर मानती, मान कर रुट जाती ।
इन अदाओ से मुझे आजमाती बहुत है ।।

दिल में बसा कर दुनिया से छिपाती ।
जाने वो इतना प्यार करती बहुत है ।।



© 'शेखर कुमावत'

ये जरुरी तो नहीं ........


दिल का रिश्ता जन्मों का हो जरुरी तो नहीं |
हर रिश्ते का नाम हो ये जरुरी तो नहीं ||

निगाहें ढूंढती है जिसका पता हर रोज़ |
वो शक्स करीब हो ये जरुरी तो नहीं ||

खामोशियाँ दिल का हाल बयां कर देती हे |
इजहार लब्जों से हो ये जरुरी तो नहीं ||

उनकी यादों का समंदर उफान पर हो |
और वो सामने हो ये जरुरी तो नहीं ||

दिल में बस कर -धड़कन में समायां हे |
फिर मेरी बाँहों में हो ये जरुरी तो नहीं ||

शेखर कुमावत

लगा कर महेंदी

लगा कर महेंदी मेरे नाम की  दिल को चुरा लिया । 
आई वो खुशबु जिसने मन को महका दिया ।।


सुहानी यादो से.............

सुहानी यादो से ना हमको सताया करो ।
ख्वाबो में आकर ना रुलाया करो ।।

दो पल के दिन, चार पलो की राते है।
रूठ कर न हमें यादो में दफ़नाया करो।।

कोई खता हो तो खता की सजा दो हमे ।
रह कर दूर, हुस्न से ना तडफाया करो ।।

मोहब्बत की सजा क्या मोत से कम है।
लिख लिख कर नाम मेरा मिटाया करो ।।


शेखर कुमावत

हाय ! ऐसी मोहब्बत

इस भरी दोपहरी में, क्यूँ शमा जलाए बैठी हो |
किसका इंतजार है , जो द्वार खोले बैठी हो||

ये कैसी तलब है, जो पलके बिछाए बैठी हो|
ये कैसी तन्हाई है, जो बेचैन हुए बैठी हो||

निकला पतझड सावन, निकला बसंत-बहार |
किसका इंतजार है, जो आस लगाए बैठी हो ||

कैसे कैसे राज़ जो ख़ामोशी ने छिपायें रखे है |
हाय ! ऐसी मोहब्बत जो परदेसी से कर बैठी हो ||

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:- शेखर कुमावत

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