मेरी कश्ती क्यूँ डुबोई ?

गम इस बात का नहीं, कि मेरी कश्ती क्यूँ डुबोई |
गम इस बात का है , कि अपनों ने क्यूँ डुबोई ||

हम तो फिर भी जी लेते कश्ती बदल कर |
फिर मगर उस कम्बक्त ने अपनी क्यूँ डुबोई ||


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Shekhar Kumawat :-

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

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  2. बहुत बढ़िया -हम तो डूबेंगें सनम ,तुम्हें भी ले डूबेंगें .
    एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,बिलकुल तेरे जैसी हो ,
    मेरा चाहें कुछ भी हो ,तेरी ऐसी तैसी हो .
    यही फलसफा है आज ज़िन्दगी का .अपने ही दुबोतें हैं कश्तियाँ ओर ड़ोंगें.

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  3. jab dubote hai apne hi kashti ...jigar se chalne vaale ...usme bhi shayri dhoodh lete hain ....badhiya ...bahut dinoke baad likha ...

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  4. वाह शेखर जी - गजब की प्रस्तुति

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  5. एक और सुन्दर कविता आपकी कलम से !

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