लबो से छुं कर.........


लबो से छुं कर जो पिलाई है हाला |
दिल मे अजीब सी जगी है ज्वाला ||

कैसे बताऊँ की क्या हुवा है मुझे |
जैसे किसी ने
पिलाई है मधुशाला ||

:- Shekhar Kumawat

23 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (14-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  2. वाह वाह!

    लबों में गजब की खुमारी है।
    उतर आई मधुशाला सारी है॥

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. is poem ko poori karke apne blog par dal deta hu . pata nahi kyu mujhse aisa hi hota hai ki hamesha tippani dene lagta hu aur bas emotions ruktte nahi . plz mere blog par bhi padhna agar samay mile to

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  5. बहुत बढ़िया!
    प्रेम-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  6. बहुत सुंदर लिखा , बस शब्द शब्द बोलता है.

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  7. बहुत सुन्दर लिखते हो। शुभकामनायें...

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  8. अच्छा प्रयास है ! शुभकामनायें !

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  9. अशेष को लगा कि दूसरा कोई छूकर गुज़र गया
    सच यह था कि 'खुद' ही खुदा होकर उतर गया।

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