सावन में आग लग गई................

जबसे जिन्दगी एक हसीन सफ़र बन गई |
दिल को उसी दिन से नई तलब लग गई ||

जालिम जमाना कहता सावन बरस रहा |
मगर हम कह रहे सावन में आग लग गई ||


श्केहर कुमावत

शेखर कुमावत की बात

नमस्कार साथियों ,

सबसे पहले में आप सब का तह : दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ ! क्यूँ की मुझे आप सब लोगो का भरपूरप्यार जो मिलता रहा है , अतः इस नाचीज़ को आप ने सराहा इस के लिए में आप सब का शुक्रगुजार हूँ |

मुझे रोज़ आप लोगो की प्यार भरी ढेर सारी टिप्पणियाँ मिलती है उससे मेरा दिल खुश नसीब इन्सान की तरहगद-गद हो जाता हे, लग भग एक महीने से मेरे द्वारा लिखी गई , कवितायेँ और मुक्तक को पड़ते रहे हैं , किन्तु मुझे धीरे-धीरे ये ज्ञात होने लगा हे कि मैं जिस काम को करने के लिए सोच रहा हूँ या सपने देखता हूँ उसके लिए मुझे बहुत मेहनत करनी होगी आम तौर पर मिलने वाली टिप्पणियाँ मेरी पोस्ट को ठीक-ठीक हीबतादेती हे , किन्तु कुछ खास और बुद्धिजीवी की बातो पर जब मैंने गौर किया तो मुझे ज्ञात हुवा कि बहुत मेहनत करने की जरुरत है , खास तोर पर किसी भी पोस्ट को प्रकाशित करने से पहले उसके बारे में हर दृष्टी कोण से सोचविचार करना चाहियें | आये दिन पिताजी भी कहते है कि मुझे ज्यादा से ज्यादा अच्छे लेखकों की किताबे पढनाऔर उन लोगो के जीवन के बारे में गहन अध्यन करना चाहियें , ताकि मै भी अपना निष्पक्ष मूल्यांकन कर सकू |

मुझे उमीद है की मै भविष्य मै इस से भी बहतर करने की मेरी और से लाजवाब कोशिस जारी रहेगी |


शेखर कुमावत

वो शबनमी लू से जल गया


वो
हवा का झोंका , जो उसके करीब से निकल गया |
बाद उस लम्हें के लाजवाब, मिज़ाज ही बदल गया ||

अब गुफ्तगुं करता रहता , वो अक्सर अपने आप से |
दवाएं इसलिए बेअसर , वो शबनमी लू से जल गया ||


शेखर कुमावत

ये दिल को समझाया न गया

अश्क पलकों पर ही थे , तब भी हम से रोया गया |
बैठी रही तुम सामने, कुछ भी हम से कहा गया ||

मंझिले दूर थी इतनी की कदम हमसे उठायें भी ना गये |
हमसफ़र बदल लिया, इस दिल को समझाया
गया ||


शेखर कुमावत

मुक्तक :-नजरों के तीर


तेरी नजरों के तीर सब जिगर के पार हो गए |
मुसाफिर सारे के सारे ही बीमार हो गए ||

हादसा ये भी हुआ, टूट गए रोजे कई फकीरों के |
खुराफातें तेरी थी, वो मालिक के गुनाहगार हो गए ||

शेखर कुमावत

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