मुक्तक- ले आई मुझे मयखाने में


शाम ढल गई , सूरज डूब गया सागर में |
और तेरी यादें, ले गई मुझे मयखाने में ||

लोग कहतें संभलझा , ए बाली उमरिया |
इश्क नहीं इतना आसां, इस ज़माने में ||



शेखर कुमावत

21 टिप्‍पणियां:

  1. SAHI LIKHA HAI JAB KISI SE PYAR HOTA HAI TO HAMESHA USKA INTJAR HI RAHTA H
    MERE SHTH BHI KUCH ESA HI DEAR

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  2. बस तेरी याद ही रही, जो ले आई मुझे मयखाने में ||...bahut sundar, badhai.

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  3. राम राम जी,
    संभालो भई अपने आप को....
    बहुत सुन्दर रचना ......!
    शुभकामनाये स्वीकार करें,और धन्यवाद सहयोग के लिए...

    कुंवर जी,

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  4. यादों को भुलाने के लिए ही तो मयखाने की शरण लेना होती है
    बहुत सुंदर मुक्तक , बधाई

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  5. tanha guzar gaya jo safar uska kya
    laut aayi ho tum par ab matlab kya
    lut gaya mai to pehle hi saaki-e-mehfil men
    tum na thin fir may ka paymana kya

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  6. कित्ता सुन्दर लिखा है आपने..है ना.

    _________________________
    'पाखी की दुनिया' में जरुर देखें-'पाखी की हैवलॉक द्वीप यात्रा' और हाँ आपके कमेंट के बिना तो मेरी यात्रा अधूरी ही कही जाएगी !!

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  7. आप मेरे ब्लॉग पर आये , अपना कीमती समय दिया और टिप्पड़ी की , धन्यावाद , आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है , आपसे नियमित प्रोत्साहन की दरकार है

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  8. बहुत सुंदर लिखा है आपने...
    बधाई...

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  9. wajan kitna bhi ho hath thamaye rakhna, daldal kitna bhi ho per jamaye rakhna, koan khta h ki chalni me pani nhi rukta, burf jamne tak hath lagaye rakhna...

    thank u 4 so efforts.... 4 help contect me........ your real brother manoj jaipur

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  10. बहुत खूब जनाब मजा आ गया दो लाइन पढ़कर
    dharmendrabchouhan.blogspot.com
    अख़बार की बात

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  11. आपने अपने परिचय में लिखा है गलतियां सुधारने में मदद करेंगे तो लो प्रोफाइल में हिंदी की कई गलतियां थी वो ठीक कर दी है। अब इसे कॉपी करके पेस्‍ट कर देना। i hope u d't mide
    dharmendrabchouhan@gmail.com
    bye tc




    अपने पांव पर खड़ा हुआ तो अपनी गलतियों से संभला , ज़माने की बातों को सुना और अपने दिल के तराजू में तोला। सोच समझकर कदम उठाना तो दूर सिर्फ चलना ही चाहा | अपनो को अपना और परायों को खास समझ कर जिन्दगी काटता रहा | दूर बैठकर एक विशाल पर्वत को रोज देखता वो कोई और नहीं मीरा की तपस्वी और पन्ना की त्याग की भूमि गढ़चित्तौड़ है | अपनी जन्मभूमि के जबरदस्त इतिहास के कारण आज तक में अपने आप को गौरवांन्वित महसूस करता हूँ | मेरे पिता व माँ शारदा की असीम कृपा से मैंने लिखना शुरू किया अपने पिता को अपना गुरु मान अपने जीवन का एक हिस्सा साहित्य को समर्पित करने का जो फैसला जो मैंने लिया उससे जीवन को एक नए रूप में जीना सीख लिया। मुझे दिल के जज्बात ज़माने के आइने में कुछ और ही नजर आये , अपनी सोच से कई गुना तेज दौड़ते इस ज़माने को देखने समझने और जानने में अपना वक़्त गुजारता रहा | आशा करता हू कि ये बातें तक पहुंचेंगी और आप मेरी गलतियों को सुधारने में मदद करेंगे|

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  12. बहुत सुंदर लिखा है आपने...
    बधाई...

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  13. शाम ढलती रही , और सूरज डूब गया सागर में |
    बस तेरी याद ही रही, जो ले आई मुझे मयखाने में ||

    लोग कहते हे संभल जाओ , ये बाली उमरिया हे |
    हम कहते हे आजाओ सजनी, अब तो तनहाई में ||
    kya baat kahi ,bahut sundar

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