शबनम के ये घूंट

शबनम के ये घूंट मुझे और ना पिला साकी |
मंजिल है दूर मेरे कदमो को ना रोक साकी ||

यहीं डगमगा ना जाऊ तेरे इश्क मे कहीं |
मेरे खवाब भी हकीकत मे बदलने दे साकी ||


:- Shekhar Kumawat

तुम से रूठ कर.......

तुम से रूठ कर कहाँ जायेंगे हम |
दिल
तेरा तोड़ कर क्या पाएंगे हम ||

ये तो दुनिया का रिवाज है प्रीतम |
जो बिछड़ कर ही मिल पाएंगे हम ||


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:- Shekhar Kumawat

तेरा दीदार


पूर्णिमा की रात, होगा बेशक तेरा
दीदार किसी तरह |
मगर निकल गया बेवफा ये आसमां भी तेरी तरह ||

उस रात, रात भर छाई घटायें फलक में चारो ओर |
चाँद दिखा ना तुम दिखे , अमावस्या की तरह ||

शेखर कुमावत

माँ ऐसा वरदान दिजो

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माँ ऐसा वरदान दिजो, जो नित करूँ सेवा तेरी |
तन मन धन सब अर्पित करूँ, चरणों मे तेरी ||

हो सबकी इच्छा पूरी ,करूँ हाथ जोड़ ये विनती |
माँ जगजननी कृपा करो, आया मै शरण तेरी ||


आप सभी को नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएं...........
नवरात्री में नवदुर्गा से मन की कामना ये है ......


:-Shekhar Kumawat


मेरे मन मंदिर में...


जब से बसा लिया मन, सांवरिया तेरी गली में |
पी लिया अमृत मैने, तेरी बांसुरी की धुन में ||

तोड़ दिए है मैने सारे नाते, इस बैरी जग के |
अब आ जाओ मनमोहन, मेरे मन मंदिर में ||



:-Shekhar Kumawat

पहले प्यार का गम......


पहले प्यार का गम किसे नहीं होता |
आखरी सलाम का दर्द किसे नहीं होता ||

उस नादानी की सजा उम्र भर मिलती है |
जबभी यादों का समंदर उफान पर होता ||


:-Shekhar Kumawat

दुनियां भी कुछ कुछ कहती है.............

अब खामोश निगाहें भी कुछ कहती है |
क्यूँ ये मुस्कुराते होठ भी कहते है ||

ये कोनसी आग लगाई तुमने दिल में |
जो ये दुनियां भी कुछ कुछ कहती है ||




Shekhar Kumawat

उठा भी दो पर्दा...........

कोई बात तो होगी मुझमे भी|
लगन लगी है
जो तुझमे भी ||

उठा भी दो पर्दा अब चहरे से |
प्रीत जगी है अब मुझमे भी ||


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शेखर कुमावत

राखी का बंधन

जिन्दगी को खुदा के दिए हुए जो तोहफे होते |
रिश्तों की भीड़ में बस, वही रिश्ते अनमोल होते ||

सारे जहां में सबसे बदनसीब है , वे तमाम भाई |
जो मतलबों के खातीर अपनी बहनों को खोते ||

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Shekhar Kumawat


ऐसा हो मेरा दोस्त


दोस्त ऐसा हो जो दिल में बस जाए |
सुरमे की तरहां आँखों में सज जाए ||
जब भी वक़्त दोस्ती का इम्तिहां ले |
वो सोने सा कसौटी पर कस जाए ||




:- शेखर कुमावत


की वो साथ नहीं ............


जो ख़्वाबों मे था , वो हकीकत नहीं |
जिसके सपने संजोये वो जन्नत नहीं ||

अरमानों के मोती जो हमने चुने कभी |
ज़माने के बाजारों मै हकीकत नहीं ||

मेरी किस्मत ने भी मुझे दगा दे दिया |
फिर भी खुदा से कोई शिकायत नहीं ||

अब याद ना कर 'शेखर' बार बार उसे |
खुश किस्मत ही समझ कि वो साथ नहीं ||



:- शेखर कुमावत

हाय ! ऐसी मोहब्बत

इस भरी दोपहरी में, क्यूँ शमा जलाए बैठी हो |
किसका इंतजार है , जो द्वार खोले बैठी हो||

ये कैसी तलब है, जो पलके बिछाए बैठी हो|
ये कैसी तन्हाई है, जो बेचैन हुए बैठी हो||

निकला पतझड सावन, निकला बसंत-बहार |
किसका इंतजार है, जो आस लगाए बैठी हो ||

कैसे कैसे राज़ जो ख़ामोशी ने छिपायें रखे है |
हाय ! ऐसी मोहब्बत जो परदेसी से कर बैठी हो ||

http://2.bp.blogspot.com/_dEbfb1gFzzY/S9bfrf5MI_I/AAAAAAAAAP0/wwHTQmrqTEY/s1600/lady_poster_angelslover_com.JPG


:- शेखर कुमावत

ना चाहूँ जहाँ में इस कदर.........



ना दिखा सकता ये दर्द- ए- दिल किसी को |
ना सुना सकता ये गमे दास्ताँ किसी को ||

है आखरी
गुजारिश, मेरे खुदा तुझसे |
ना चाहूँ जहाँ में इस कदर फिर किसी को ||




:- शेखर कुमावत


राज़ बयां होने दो ...................

आज मुझे फिर , मदहोश होने दो |
पी-पी कर जाम, सारा होश खोने दो ||

ना रोको मुझे जालिम ज़माने वालो |
आज दिल का हर राज़ बयां होने दो
||


:-शेखर कुमावत

कविताओं का योगदान

स्वतंत्रोपरांत भारत की सातवीं जनगणना 2011 का राष्ट्र् व्यापी बिगुल बज चुका है। प्रथम चरण का कारवां प्रशिक्षण के साथ ही अपनी माकूल रफ्तार से मंजिल की ओर लगातार बढ़ रहा है । जनगणना विभाग द्वारा सामान्य हिन्दी में रचित दोनों पुस्तिकाओं में सभी बिन्दुओं को भली भांति स्पष्ट किया गया है। एक बात को अभिव्यक्त करने के कई तरीके हो सकते हैं जिनमें कविताएं भी काफी एहमियत रखती हैं । कविता रूपी मिठाइयों को यदि सही सलीके से हॅंसी की चासनी से तैयार किया जाय तो उनका स्वाद बेशक लाजवाब हो जाता है । कभी-कभी हॅंसते-हॅंसते , पसीना बहाते हुए मई-जून की धूप में पहाड़ों पर दौड़ते हुए चढ़ जाना भी दिल को बड़ी खुशी और शुगून दे जाता है ,मगर दिल की मायूसी के साथ तो घर की सीढ़ियां उतरने में भी आखिरी सीढी तक खौफ़ बरकरार रहता है । देखा है कई बार हमने हास्य कविताएं ,जब-जब भी अपना रूख मोड़ती है ।आप तो बत्तीसी वाले हैं जनाब , वो तो बिना दांॅत वालों को भी हॅंसा-हॅंसा कर छोड़ती हैं ।ऐसी ही कविताओं में एक बहु चर्चित राजस्थान राज्य के चित्तौड़ शहर निवासी हास्य कवि अमृतवाणी का नाम भी सम्मान से पुकारा जाता है। आपने ’ भारत की जनगणना 2011 ’ की मकान सूचीकरण एवं एन0पी0आर0 हेतु परिवार अनुसूची भरने के लिए अनुदेश पुस्तिकाओं का मास्टर ट्रेनर के रूप में प्रशिक्षण देने हेतु गहन अध्ययन तो किया ही है , किन्तु साथ-साथ महत्वपूर्ण बिन्दुओं को हास्य कविताओं --कुण्डली काव्य ---द्वारा जो सुस्पष्टता एवं हृदयग्राही रोचकता दी है जो बेशक लाजवाब और काबिले तारीफ है ।
इनकी कविताएं श्रीकृष्ण की शाश्वत मुस्कान की तरह हैं जो ना तो कभी पूर्ण विराम लेती है ना कभी किसी के अन्तर्मन को ठेस पहुंचाती हैं । अमृत ’वाणी’ द्वारा रचित लगभग छोटी-बड़ी 18-20 पुस्तकों में यह कुुण्डली काव्य राष्ट्रीय कार्यक्रम को अपनी मंजिल तक पहुंचाने में हर पाठक को बेशक मददगारके रूप में महसूस हो रही है । सन् 2001 वाली पीछली राष्ट्रीय जनगणना में भी आपने अपनी कविताओं द्वारा जनमानस के राष्ट्रीय चिंतन को अधिकाधिक सुस्पष्ट एवं अनुकरणीय बनाया था

वैसे
तो भारत के महारजिस्ट्रार जनगणना आयुक्त का कार्यालय गृह मंत्रालय ,भारत सरकार नई दिल्ली द्वारा मुद्रित एवं प्रकाशित दोनों पुस्तकें ही पूर्णतः प्रामाणिक अक्षरस अनुकरणीय एवं श्लाघनीय हैं फिर भी अमृतवाणीकी छोटी-छोटी कविताएं पर्यवेक्षक ,प्रगणक एवं समस्त उत्तरदाताओं के लिए एक प्रभावी उत्प्रेरक की भूमिका सा सफल निर्वहन अवश्य कर रही हैं

अमृतवाणीसृजनशील रहते हुए शतायु होएं।

अधिक जानकारी के लिये आप http://janganana.blogspot.com/ ब्लॉग देखे |

भवदीय
  • शेखर कुमावत

हैं माँ ......................

हैं माँ
मेने देखा
मैंने समझा

ये दुनिया कितनी छोटी हे
और तेरा आँचल कितना बड़ा हे

तेरे आँचल में मिले मुझे लाख फूल
दुनिया में मिले कदम कदम पर लाख शूल

तुने हर कदम पर संभाला
दुनिया ने हर कदम पर गिराया

सबसे बड़ा तेरा दिल
बाकी सब पत्थर दिल

बस माँ तेरा तेरा आँचल मिले
रख कर उस में सिर

मीठी मीठी लोरी सुनु
प्यारी प्यारी बाते सुनु

बस माँ तेरा आँचल मिले

शेखर कुमावत

इशारो की जबां..............

छिपायें रखना जज्बातों को अच्छा नहीं |
डरते जाना जालिम ज़माने से अच्छा नहीं ||

ना समझ सके जो इशारो की जबां को |
उन्हें जुबां से समझाना भी अच्छा नहीं ||


http://4.bp.blogspot.com/_KJXYLC7TsEQ/SuLkKCx3QvI/AAAAAAAAAPE/AshmU_SkZA0/s320/yaad.jpg

सावन में आग लग गई................

जबसे जिन्दगी एक हसीन सफ़र बन गई |
दिल को उसी दिन से नई तलब लग गई ||

जालिम जमाना कहता सावन बरस रहा |
मगर हम कह रहे सावन में आग लग गई ||


श्केहर कुमावत

शेखर कुमावत की बात

नमस्कार साथियों ,

सबसे पहले में आप सब का तह : दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ ! क्यूँ की मुझे आप सब लोगो का भरपूरप्यार जो मिलता रहा है , अतः इस नाचीज़ को आप ने सराहा इस के लिए में आप सब का शुक्रगुजार हूँ |

मुझे रोज़ आप लोगो की प्यार भरी ढेर सारी टिप्पणियाँ मिलती है उससे मेरा दिल खुश नसीब इन्सान की तरहगद-गद हो जाता हे, लग भग एक महीने से मेरे द्वारा लिखी गई , कवितायेँ और मुक्तक को पड़ते रहे हैं , किन्तु मुझे धीरे-धीरे ये ज्ञात होने लगा हे कि मैं जिस काम को करने के लिए सोच रहा हूँ या सपने देखता हूँ उसके लिए मुझे बहुत मेहनत करनी होगी आम तौर पर मिलने वाली टिप्पणियाँ मेरी पोस्ट को ठीक-ठीक हीबतादेती हे , किन्तु कुछ खास और बुद्धिजीवी की बातो पर जब मैंने गौर किया तो मुझे ज्ञात हुवा कि बहुत मेहनत करने की जरुरत है , खास तोर पर किसी भी पोस्ट को प्रकाशित करने से पहले उसके बारे में हर दृष्टी कोण से सोचविचार करना चाहियें | आये दिन पिताजी भी कहते है कि मुझे ज्यादा से ज्यादा अच्छे लेखकों की किताबे पढनाऔर उन लोगो के जीवन के बारे में गहन अध्यन करना चाहियें , ताकि मै भी अपना निष्पक्ष मूल्यांकन कर सकू |

मुझे उमीद है की मै भविष्य मै इस से भी बहतर करने की मेरी और से लाजवाब कोशिस जारी रहेगी |


शेखर कुमावत

वो शबनमी लू से जल गया


वो
हवा का झोंका , जो उसके करीब से निकल गया |
बाद उस लम्हें के लाजवाब, मिज़ाज ही बदल गया ||

अब गुफ्तगुं करता रहता , वो अक्सर अपने आप से |
दवाएं इसलिए बेअसर , वो शबनमी लू से जल गया ||


शेखर कुमावत

ये दिल को समझाया न गया

अश्क पलकों पर ही थे , तब भी हम से रोया गया |
बैठी रही तुम सामने, कुछ भी हम से कहा गया ||

मंझिले दूर थी इतनी की कदम हमसे उठायें भी ना गये |
हमसफ़र बदल लिया, इस दिल को समझाया
गया ||


शेखर कुमावत

मुक्तक :-नजरों के तीर


तेरी नजरों के तीर सब जिगर के पार हो गए |
मुसाफिर सारे के सारे ही बीमार हो गए ||

हादसा ये भी हुआ, टूट गए रोजे कई फकीरों के |
खुराफातें तेरी थी, वो मालिक के गुनाहगार हो गए ||

शेखर कुमावत

और तबाह हो गए


वफ़ा के नगमे गाते-गाते, यूँ बेवफ़ा हो गए |
तेरी खेरियत का ख़त पढ़ा और खफा हो गए ||

खुदा ने तुझे किस मिटटी से बनाया जालिम |
आए तेरे दीदार के वास्ते, और तबाह हो गए ||

शेखर कुमावत

मुक्तक- ले आई मुझे मयखाने में


शाम ढल गई , सूरज डूब गया सागर में |
और तेरी यादें, ले गई मुझे मयखाने में ||

लोग कहतें संभलझा , ए बाली उमरिया |
इश्क नहीं इतना आसां, इस ज़माने में ||



शेखर कुमावत

तेरा दीदार


पूर्णिमा की रात, होगा बेशक तेरा
दीदार किसी तरह |
मगर निकल गया बेवफा ये आसमां भी तेरी तरह ||

उस रात, रात भर छाई घटायें फलक में चारो ओर |
चाँद दिखा ना तुम दिखे , अमावस्या की तरह ||




शेखर कुमावत

मुक्तक :- तुमसे पलटा न गया


उठ कर जो गये तुम, हमसे देखा भी न गया |
जाम छलकते रहे , हमसे पिया भी न गया ||

आज भी आवाजें देता हूँ हर रात के अँधेरे में |
खड़ा हो उसी मोड़ पर, जहाँ तुमसे पलटा गया ||

[FTARDE.gif]
शेखर कुमावत


तेरा ही चेहरा भाया

कैसा उल्फत का जूनून, मेरे दिल में समाया |
हजारो चहरो में , बस तेरा
ही चेहरा भाया ||

कदम कदम पर ठोकरें इम्तिहां मेरा लेती रही |
हार कर उन्हींने, रास्ता तेरे घर का दिखाया ||

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शेखर कुमावत

विनती मांकी हुणिंजों , पवन पुत्र हडुमान |


विनती माकी हूणिजो, पवन पुत्र हडुमान |
संकट सबका टाळजो , महावीर बलवान ||

सीता रा संकट हरया, पायो जग में नाम |
त्यूं सबकी रक्षा करो , सिद्ध करो सब काम ||


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शेखर कुमावत

फिर भी ऐसी क्या बात हो गई ....................


तेरी हँसी जिगर के पार हो गई ,
तू रूठी तो आसुंओ की धार हो गई |

बाते नकद की ,
सभी क्यूँ उधार हो गई ||

हाय तेरा रूठ जाना ,
मेरा
बार बार मनाना |

हम तो दिल के मारे हें ,
और तू किस्मत की मारी हे ||





शेखर कुमावत

हैं माँ

हैं माँ
मेने देखा
मैंने समझा

ये दुनिया कितनी छोटी हे
और तेरा आँचल कितना बड़ा हे

तेरे आँचल में मिले मुझे लाख फूल
दुनिया में मिले कदम कदम पर लाख शूल

तुने हर कदम पर संभाला
दुनिया ने हर कदम पर गिराया

सबसे बड़ा तेरा दिल
बाकी सब पत्थर दिल

बस माँ तेरा तेरा आँचल मिले
रख कर उस में सिर

मीठी मीठी लोरी सुनु
प्यारी प्यारी बाते सुनु

बस माँ तेरा आँचल मिले

शेखर कुमावत

“नव संवत्‍सर की मंगलकामनाएँ!”

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“नव संवत्‍सर की मंगलकामनाएँ!”

शेखर 'कुमावत'

काव्य 'वाणी'

नमस्कार साथियों में शेखर कुमावत अपनी रूहानी आवाज के साथ आप सब के लिए लाया हु मेरा अपना ब्लॉग

काव्य 'वाणी'


आशा हे इस नए ब्लॉग के जरिये आप तक अपने दिली जज्बात को पंहुचा ने में कामियाब होऊंगा |



१५/३/20010
शेखर कुमावत


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